रविवार, 27 नवंबर 2011

नाकारा विपक्ष


जितनी नाकारा और संवेदनाविहीन भारत की केन्द्रीय सरकार साबित हो रही है उतना या उससे कहीं ज्यादा विपक्ष नाकारा साबित हो रहा है .कमजोर विपक्ष या कहिये की नाकारा विपक्ष होने की वजह से ही सरकार बिलकुल निरंकुश हो चुकी है. मंत्रिमंडल में ऐसे फैसले लिए जा रहे है जो पूरी तरह से देश को गर्त में ले जा रहे है और इन पर किसी का भी अंकुश या डर नहीं है , कोई भी ऐसा मुद्दा जब भी संसद के सदनों में उठता है तो विपक्ष सिर्फ सदन से बाहर जाकर या फिर 5 -7  दिन संसद ठप्प करवाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते है.वो लोग ये नहीं सोचते है की जिस जनता ने सरकार में शामिल लोगो को जितवाकर ये फैसले लेने या कानून बनाने का अधिकार दिया है उसी जनता के एक वर्ग ने आप में विश्वास दिखाकर आपको संसद में भेजा है ,और वो इस लिए भेजा है की आप संसद में खड़े होकर जनता से सीधे जुड़े हुए मुद्दों पर जनता की आवाज को संसद में बुलंद करो,लेकिन आप सिर्फ कुछ दिन शोर शराबा करके उस बात को ठंडी कर देते हो और देश की जनता पर  एक और गलत फैसले को थोपने  की आजादी सरकार को  दे देते हो.
जनता आपसे आशा रखती है की जहाँ जनहित से जुड़े मुद्दे आये वहां आप वास्तव में वही बात स्वीकार करोगे जो वास्तव में जनता के हित में होगी,लेकिन कमजोर और अकर्मण्य विपक्ष की वजह से देश पर एक और गलत फैसला खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में थोपने की तैयारी चल रही है .
सरकार को भी मालूम है की विपक्ष कुछ दिन शोर मचाएगा फिर अपने आप या तो चुप हो कर बैठ जायेगा या और अन्य किसी मुद्दे को उठाकर शोर-शराबे और बहिर्गमन में लग जायेगा ,तब तक सरकार इस को लागु कर चुकी होगी.
क्या लोकतंत्र में विरोध करने के ये ही तरीके बचे है की संसद की कार्रवाही ठप्प करवा दो या फिर बाहर चले जाओ और संसद चलने का प्रतिदिन का खर्च जो लगभग शायद पंद्रह करोड़ है ,का बोझ और जनता पर डाल दो. क्यों नहीं विपक्ष सरकार के ऐसे फैसलों के खिलाफ संसद के बाहर जोरदार तरीके से विरोध करता है? क्या वो संसद के बाहर जन-आन्दोलन खड़े नहीं कर सकते या फिर प्रधानमंत्री और अन्य जिम्मेदार मंत्रियों का उनके घर या कार्यालय में घेराव या धरना देकर नहीं बैठ सकते ? क्यों नहीं वो संसद के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से देश की सार्वजनिक संपत्ति को नुक्सान पहुंचाए बिना पूरे  देश में आन्दोलन चलाकर सरकार को मजबूर  कर सकते की वो ऐसे देश विरोधी फैसलों को वापस ले.
लेकिन वो तो नेता है चाहे वो सत्ता पक्ष के हो या विपक्ष के ,आम आदमी के दर्द और कठिनाइयों को न तो समझ सकते है न ही उनका कोई सरोकार है. वो तो बस संसद में बैठ कर ऐसी योजनायें बना सकते है जो विकास के नाम पर बनती है लेकिन उनसे देश के विकास का दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता, हाँ उन नेताओं का 'विकास' जरूर हो जाता है. वो तो  नरेगा जैसी योजनाये बनाते है जिनसे देश के कर दाताओं का 35000  करोड़  रुपया नेताओं ,आला अफसरों,और सरपंचों-ग्रामसेवको,मेटों आदि में बंट जाता है और जनता के हिस्से में आती है सड़क के किनारे पर डाली हुयी मिटटी या फर्जी मस्टर-रोलों की रद्दी.
क्या करता है विपक्ष जब ऐसी योजनाओं का खाका तैयार हो रहा होता है.
अगर भारत को विदेशी व्यापारियों के जाल से बचाना है तो किसी भी हाल में देश के खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को रोकना ही होगा, ये काम  विपक्ष को प्राथमिकता से करना होगा और बल्कि सत्ता पक्ष के भी किसी सदस्य को भी यदि उचित लगे तो देश हित में पार्टी लाइन से बाहर जाकर ऐसे मुद्दों का विरोध करना चाहिए तब ही वो सही मायनों  में लोक सेवक साबित होगा.

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