एक शाश्वत रीत है की बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को खा जाती है ,मल्टी ब्रांड रिटेल को भारत में लाकर कुछ ऐसा ही कर रहे है हमारे माननीय नीति निर्धारक ,लेकिन अर्थशास्त्री के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार के सिपहसालारों को लगता है दुनिया की ये रीत मालूम नहीं है या फिर किसी के द्वारा आँखों और कानो पर पट्टी बंधवा कर इस रीत को नजरंदाज करके बड़ी मछलियों के सामने छोटी मछली को परोस रहे है और ऊपर से इस को जायज़ ठहराने में लगे है.
मुझे नहीं मालूम की मनमोहन सरकार में नीतिगत फैसले लेते समय किसका भला सोचा जाता है ,किसी एक भी भारतीय का भला तो मल्टी ब्रांड रिटेल से होने वाला नहीं है ,फिर ये सरकार किसका भला करना चाहती है. कम से कम ऐसे फैसले लेने वाला व्यक्ति भारत का भला सोचने वाला तो नहीं हो सकता,और मुझे तो ये लगता है वो भारतीय भी नहीं हो सकता और अगर वो भारतीय नागरिकता रखता भी है तो मन से भारतीय नहीं है . कोई भी व्यक्ति भारतीय कैसे हो सकता है जब की वो ऐसा काम करने जा रहा है जिस से उसको मालूम है भारत के तमाम उद्योग धंधे बर्बाद हो सकते है,लघु उद्योगों और कृषी आधारित लोगो की तो पूरी तरह से कमर टूट जानी है .पहले ही भारत में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है और अब तो रब ही जाने ये समस्या कैसा विकराल रूप लेगी .ऐसा लगता है की जान - बूझ कर भारत को बर्बाद करने की साज़िश की सोची समझी कार्य योजना के तहत ही ऐसा किया जा रहा है .अंग्रेज भी सबसे पहले व्यापारी बन कर ही आये थे लेकिन इतिहास गवाह है की व्यापारी बन कर आये उन अंग्रेजो ने देश को २०० सालों तक गुलाम तो रखा ही साथ ही देश की सभ्यता और संस्कृति को ऐसा बर्बाद कर गए की आज भी हिंदुस्तान अंग्रेजियत से मुक्त नहीं हो पाया है. उनकी साम्राज्यवादी सोच और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है और हमारी समाजवादी सोच और अर्थव्यवस्था है ,लेकिन देश के कुछ अति-बुद्धिजीवियों की वजह से या फिर कुछ देशी के आवरण में बंद विदेशी लोगो की वजह से भारत को एक बार फिर आर्थिक गुलामी की ओर धकेला जा रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था पुरातन काल से मूल रूप से चाणक्य के अर्थ शास्त्र पर आधारित रही है और इसी वजह से विश्वव्यापी मंदी के दौर में भी भारतीय बाजार को कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ था, जिस मंदी के दौर में अमेरिका जैसा मजबूत अर्थव्यवस्था वाला पूंजीवादी देश भी गंभीर आर्थिक संकट में आ गया था, उस दौर में भारतीय बाजार उस विश्वव्यापी मंदी से सिर्फ इसी लिए बचे रहे की भारतीय व्यापारियों की अर्थ व्यवस्था चाणक्य पर आधारित थी.वो क्रेडिट कार्डो और पूंजीवाद पर आधारित नहीं थी. आज भी हर भारतीय में बचत की प्रवृति है इस वजह से भारतीय व्यापारी दुनिया भर में सिरमौर बने बैठे है. लेकिन मुश्किल तो ये है भारत के नेताओं में बचत की प्रवृति न हो कर संचय की प्रवृति है ,तिस पर स्विस बेंकों जैसी संस्थाए इनको "संचय" के लिए उचित स्थान देती रही है, मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश से उन मुठ्ठी भर लोगों के संचय में जरूर इजाफा होगा जो ऐसे प्रस्तावों को हरी झंडी दे रहे है.लेकिन कैसे अर्थ शास्त्री है हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी जो छोटी मछली को जबरन बड़ी मछली के सामने परोस रहे है.
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