मंगलवार, 22 नवंबर 2011

देश का भविष्य आप के हाथ

मेरे शहर के युवा इतने आधुनिक हो गए है की सुबह ८-९ बजे जब आँख खुलती है तो सबसे पहले भगवान के दर्शन नहीं करते है , आँख खुलते ही सबसे पहले वो मोबाईल हाथ में उठाते हैं और देखते है की किस किस की मिस कॉल आ रखी है और किस किस के मेसेज आ रखे हैं . माने तो मोबाईल नहीं हुआ कोई भगवान की मूरत हुई .उसके बाद भी कौन सा जाकर माँ-बाप के पाँव छु ने जायेंगे, उसके बाद अपनी "फ्रेंड" को फोन लगायेंगे और उसको गुड मोर्निंग बोलेंगे फिर जाकर माँ या जो भी घर में रसोई की मालकिन होगी उसको उलाहना देंगे की मुझे जगे इतना टाइम हो गया अभी तक चाय क्यों नहीं बनाई. जैसे तैसे चाय का कार्यक्रम निबटा कर भागते दोड़ते नहा धोकर घर से कॉलेज के लिए निकल जायेंगे और नाश्ता टेबल पर ही  पड़ा इसलिए छोड़ जायेंगे की बहार दोस्तों ने बाइक का होर्न बजाना स्टार्ट कर दिया है .कॉलेज के रास्ते में अपनी फ्रेंड को भी एक झलक मिल कर जायेंगे और अगर रस्ते में किसी दोस्त ने ये कह दिया की यार क्या करेंगे कॉलेज जाकर आज तेरीवाली और मेरीवाली दोनों ही नहीं आ रही है झट से बाइक को किसी मोल या मल्टीप्लेक्स की तरफ मोड़ देंगे .वह जाकर उनको भूख का अहसास होगा तो पेप्सी के साथ पिज़ा या चाउमीन खा लेंगे, मन हुआ तो किसी फिल्म में तीन घंटे गुजार देंगे और बाहर निकलेंगे तब तक फ्रेंड से मिलने का कार्यक्रम बन चुका होगा, स्पीड से बाइक चलते हुए २-४ कट मार कर एक आध सिग्नल पार करके जल्दी से अपनी मंजिल तक पहुच जायेंगे और उसे पिक कर के ले जायेंगे किसी बगीचे या रेस्टोरेंट में और अपनी जेब का वहां पूरी तरह से दोहन करवा कर ही वापस लोटेंगे . फिर जब घर पहुचेंगे तो वहां जाते ही माँ कहेगी की बेटा जा जाकर बाज़ार से थोड़ी सब्जी और दादाजी की दवा तो ला दे तो बेटा माँ के गलबहियाँ डालते हुए कहेगा अरे मोम आज तो केमिस्ट्री वाले सर ने लगातार चार पीरियड तक पढ़कर दिमाग का दही बना दिया है ...प्लीज़ पापा से मंगवा लेना ....मैं बहुत थका हुआ हूँ .......और फिर अभी मुझे मेरे दोस्त के घर कीर्तन में भी जाना है ....राहुल अभी आता ही होगा बुलाने ........इतने में ही फिर से बाइक का होर्न बजता है और माँ का लाडला बेटा "कीर्तन" में शामिल होने के लिए चल पड़ता है उनकी मंजिल होती है कोई पब या बार या ऐसी ही  कोई जगह , वहां पहुचने से पहले रास्ते मैं पैसे के जुगाड़ में भी लगना पड़ता है. बार में जाते ही वेटर को बुलाकर लार्ज का आर्डर दिया जाता है और ये आर्डर तब तक दिए जाते रहते है जब तक की दिमाग का दही वापस दूध नहीं बन जाता उसके बाद झूठा सच्चा खाना और बारह एक बजे तक "कीर्तन" से घर वापसी. माँ बेचारी इंतजार में बैठी रहती है की बेटा भूखा है वो आ जाये तो उसको खिलाकर ही मैं भी खाना खा लुंगी लेकिन बेटा तो घर में घुसते ही घोषणा कर देता की मोम...रेखा आंटी ने बिना खाना खाए आने ही नहीं दिया , माँ सोचती है चलो मेरा बेटा भूखा तो नहीं है अब तो मैं भी खाना खा लेती हूँ . बेटे को ये सब देखने या सोचने की कहाँ फुर्सत , वो तो अपने कमरे में जाकर लेप-टॉप स्टार्ट कर चुका है और अगले कुछ घंटो के लिए चेटिंग की दुनिया में खो चुका है . माँ फिर से ऐसे ही एक और अगले दिन की तैयारी करते हुए और अपने बेटे को एक डाक्टर या इंजीनियर के रूप में देखने के सपने बुनती हुई सो जाती है
ऐसे है मेरे शहर के युवा .
क्या आपके शहर के युवा भी ऐसे ही है ?
अगर आप को लगता है की आप के शहर के युवा भी ऐसे ही है तो अपने घर के बच्चो के कार्य कलापों पर नजर डालिए की कही वो तो ऐसे नहीं बन रहे.
अगर आप चाहते की आप के बच्चे ऐसे नहीं हो तो उन्हें अच्छे संस्कार दीजिये, उन्हें ऐसी स्कूल में दाखिला दिलाइये जहाँ माँ को "मोम" कहना न सिखाया जाता हो बल्कि हाय की जगह पाँव छूने की शिक्षा दी जाती हो.
अपने घर के बच्चो को सास बहु और एकता मार्का सीरियलों से दूर रखिये उन्हें पिज़ा और पेप्सी जैसी चीजो से दूर रखिये क्यों की जो पोषण और ताकत घी दूध और माँ के हाथ के परांठे में है वो पिज़ा बर्गर और चाउमीन में नहीं है 
याद रखिये बच्चा वो ही सीखता और करता है जो वो  अपने आस पास के लोगो को  करते देखता है इसलिए आप को यदि सभ्य सु-संस्कारित औलाद चाहिए तो सब से पहले आप स्वयं को ऐसा बनना पड़ेगा.
देश का भविष्य युवा है और युवा होने से पहले वो एक बच्चा ही होता है , अतः बच्चे को दिए हुए अच्छे संस्कार देश के भविष्य को निर्धारित करते है.
सोच लीजिये देश के  भविष्य में आपका भी योगदान  है   

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