शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

लोबिंग

पिछले 9 दिनों से ठप्प चल रही संसद अगले चार दिनों के लिए स्थगित हो गयी.वैसे भी 9 दिनों में संसद में कोई भी काम नहीं हुआ सिवाय हंगामे और शोर-शराबे के. भारत की जनता से वसूले गए 135  करोड़ रूपये जरूर पानी में बह गए क्यों की संसद का एक दिन का खर्च लगभग 15 करोड़ है. खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को मंजूरी देने के फैसले ने सरकार को एक बार फिर ऐसे भंवर या चक्रव्यूह में फंसा दिया है जहाँ से वापस निकलने का रास्ता सरकार को नजर नहीं आ रहा है. अब ये मुद्दा सरकार के लिए गले में फंसी हुई हड्डी के जैसी हो गयी है जिसको न निगलते बन रहा है न ही उगलते बन रहा है. हालाँकि सरकार को चारों ओर से फंसी देख कर स्वयं सोनिया गाँधी ने इस संकट से निपटने के लिए कमान संभाली है, सरकार के वाक-चतुर और मीडिया फ्रेंडली समझे वाले चेहरों का समूह या कहिये की 'लोबी' बनायीं गयी है जो की मीडिया की हर बात का जवाब देगी,विरोधियों की हर बात का जवाब देगी, और इस मुद्दे पर आम जनता में सरकार के पक्ष में वातावरण का  निर्माण करेगी.
अमेरिका में इस तरह की कारगुजारियों को क़ानूनी मान्यता मिली हुई है, वहां इस तरह की कारगुजारियों के लिए एक शब्द प्रयुक्त किया जाता है, "लोबिंग". आम तौर पर भारत में ऐसा कोई कार्य कानूनन नहीं है लेकिन अमेरिका का कानून वहां इस काम को कानूनी मान्यता देता है वहां प्रोफेशनल लोब्बिस्ट है जो किसी कंपनी या किसी नेता के पक्ष में लोबिंग करते है और उसके के लिए वातावरण तैयार करते है. वोलमार्ट कंपनी का लोबिंग का कई करोड़ डोलर का बज़ट है. पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के एन पहले वोलमार्ट के मुख्य कार्यकारी माइक ड्यूक भारत आये थे. लगता है वो ही भारत में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के लिए जमीन तैयार कर गए,और उसका नतीजा सब के सामने है, और अब तो सरकार खुद  लोबिंग करने में लगी हुई है. हम ये नहीं मानते की लोबिंग करना बुरी बात है लेकिन लोबिंग करो तो देश के भले के लिए करो , देश को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में और मजबूत बनाने में करो,  भला देश को बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने परोसने के लिए क्या लोबिंग कर रहे हो. अरे देश के कर्ण धारों !  नीति निर्धारकों ! ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत को भूखे भेड़िये की जैसे ताक रही है की कब मौका मिले और इस देश की गरीब जनता का खून पियें. जो चमक दमक तुम्हे दिखाई  दे रही  है वो कुछ पलों की ही है, उसकी बाद आर्थिक गुलामी का अँधेरा हो जायेगा जो की चिर स्थायी होगा, इसलिए देश के नीति निर्धारकों कुछ तो समझो और सोचो........... देश को वापस गुलामी की तरफ मत धकेलो वो भी बाहरी लोगों के बहकावे में या चंद गुलाबी कागज़ टुकड़ों के लालच में........ 

1 टिप्पणी:

  1. देश और जनता की सोचना तो शायद छोड़ ही दिया है इन्होनें .... संतुलित ,सार्थक पोस्ट

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