रविवार, 3 जून 2012

जनरलों की मुसीबतहिंदुस्तान में आजकल जनरलों की हालतधोबी के कुत्ते जैसी हो रखी है, न तो घरके रहे है और न ही घाट के !आज एक और जनरल अपनी कैरियर केमहत्वपूर्ण एक साल को सरकार के हाथों गंवाकर रिटायर हो गए, साथही सरकार की कार्यशैली औरविश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा गए.पहली बार भारतीय सेना के प्रमुखको अपने ही देश की सरकार के खिलाफअदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा, और उनकी इस ध्रष्टता के लिए शायदउनको अपनी बाकि की जिंदगी अदालतों केचक्कर लगाने में ही बितानी पड़ेगी.क्या करे बेचारे जनरल जो ठहरे, अगरवो जनरल के बजाय कोई दलितया अल्पसंख्यक होते तो हजारों राजनितिक और गैरराजनैतिक संगठन और व्यक्ति उनके पीछेखड़े हो जाते, लेकिन 'जनरल'कभी भी वोट बैंक की परिभाषा मेंनहीं आते, अगर ऐसा होता तो मुलायम,लालू, मायावती और सलमान खुर्शीद सरीखे नेताओं में जनरल के हिमायती बननेकी होड़ सी मच जाती और जनरलको आज ही सेना से लास्ट परेडकी सलामी न लेनी पड़ती, और नही प्रधानमंत्री कार्यालयकी किसी आला अधिकारी की हिम्मत पड़ती की जनरल की देश में सैन्य सामानऔर गोला बारूद की कमी को लेकरप्रधानमंत्री को लिखी गयी अति-गोपनीयचिट्ठी को मिडिया को लीक कर दे.लेकिन क्या करते ? बेचारे 'जनरल' जो ठहरे ! खैर अब तो इस देश में जनरलों को दोयमदर्जे का नागरिक बने रहने की आदतसी पद गई है, क्यों की अगरवो विद्यार्थी है तो उसके प्रथम श्रेणी केअंक होते हुए भी किसी अच्छे संस्थान मेंउसको दाखिला न दिया जाकर किसी 'वोट बैंक' श्रेणी के तृतीयश्रेणी अंको वाले उसी केसहपाठी को सिर्फ इस लिएदाखिला मिलता जिसके लिएवो योग्य नहीं है, लेकिन बेचारा जनरलक्या कर सकता है. अगर वो कोईकर्मचारी या अधिकारी हैतो उसको तो उसी पद से रिटायरहोना है जिस पद परउसकी नियुक्ति हुयी है. हाँ उसका कोईभी मातहत व्यक्ति उस से आगे जाकर उसी का अफसर बन सकता है, जैसेकी यदि कोई जनरल पुलिस में उपनिरीक्षक पद पे नियुक्त होता हैतो उसको तो ये मान लेना चाहिएकी उसे जिंदगी भर उप निरीक्षकही रहना है, या फिर ज्यादा ही उसके सितारे बुलंद है तो वृत निरीक्षक बन केरिटायर हो सकता है, वहीँ उसका कोईमातहत यदि उस विशेष श्रेणी का हुआजिसको हिंदुस्तान में आरक्षित वर्गकहा जाता है तो निश्चितही वो अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक तक पहुँच जायेगा. लेकिन जनरलबेचारा क्या कर सकता है ?अब वो दिन दूर नहीं है जब की रोडवेजकी बस में चढ़ते ही कंडक्टर आपसेजाती प्रमाण पत्र मांगेगा, अगर आपअल्पसंख्यक या एस टी है तो आपको सीट न. १ से १५ तक बैठने का अधिकार है,यदि आप एस सी वर्ग के आरक्षण से सु-संपन्न है तो आपको सीट न. मिलेगा १६ से३०, ओ बी सी वर्ग को उपलब्धतानुसार३१ से ५० न. तक की सीट मिल जाएगी,लेकिन अगर आप अनारक्षित वर्ग का जाती प्रमाण पत्र लेकर बस में चढनेलगे तो कंडक्टर आपको तुरंत नीचे उतारदेगा और कहेगा की बस की छत पर देखलो अगर जगह मिले तो चढ़ जाना औरहाँ ये शर्त है की अगर कोई आरक्षित वर्गका यात्री आ जाता है तो तुझे उसी समय बस की छत पर से भी उतरजाना होगा क्यों की ये सरकारी बस है.क्या करे बेचारा जनरल जो ठहरा !!!



गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

जबरदस्ती के भगवान


पिछले दो दिनों से राजस्थान में सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल चल रही है. पूरे राज्य में चिकित्सा व्यवस्था लगभग ठप्प हो गयी है.अस्पतालों में हा-हाकार मचा हुआ है. आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति तो निजी चिकित्सालयों में जाकर अपना इलाज करवा लेता है लेकिन बेचारे गरीब और बेसहारा लोगों का तो भगवान ही मालिक है. हर अख़बार में और प्रत्येक चेनल पर डाक्टरों के अभाव में मरते मरीजों की फोटुए दिखाई जा रही है और साथ में ये भी दिखाया जा रहा है की जिस चिकित्सक को भगवान का रूप समझा जाता है उनकी अमानवीयता की वजह से मरीजों की जान पर बनी हुई है.
लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है, जिसको न तो मीडिया दिखा रहा है और न ही नौकर शाहों के द्वारा भ्रमित किये हुए सरकारी तंत्र को दिख पा रहा है. किसी ने भी गहराई में जाकर ये जानने की कोशिश नहीं की ,की आखिर ऐसी क्या नौबत आई की चिकित्सकों को हड़ताल जैसा कदम उठाना पड़ा ? गत जुलाई में चिकित्सकों ने एक दिन की सांकेतिक हड़ताल करी थी,उस समय सरकार और डाक्टरों के प्रतिनिधिमंडल के बीच एक समझौता हुआ था, सरकार द्वारा लिखित रूप से उस समझौते के बिन्दुओं पर तीन माह के अन्दर अन्दर अमल करने का वायदा किया गया था. उस बात को लगभग छ: माह बीत जाने के बाद भी कोई भी बिंदु अमल में लाया गया न ही किसी प्रकार का कोई  उस से सम्बंधित आदेश निकाला गया. ऐसी परिस्थितियों में हड़ताल करना चिकित्सकों के लिए एक ही रास्ता बचा था. तिस पर भी सरकार बजाय हड़ताल को टालने के ईमानदार प्रयासों के, उलटे अपनी पूरी उर्जा चिकित्सकों को गलत और सरकार को सही ठहराने में लगा रही है. हिंदुस्तान में आम आदमी की ये सोच होती है की जो बात अख़बारों में छपती है या किसी भी सम्प्रेषण माध्यम से जो भी खबर आती है वो उसको अक्षरश सत्य मानता है, वो कभी भी उसकी पड़ताल करने की कोशिश नहीं करता है की क्या सच है और क्या झूठ.  सरकार जनता की इसी सोच को भुनाने में लगी है. अख़बारों में ऐसे शीर्षकों के साथ ख़बरें छप रही है, "नहीं पसीजे भगवान" , "मुख्यमंत्री ने की मार्मिक अपील" आदि आदि. कोई भी मीडियाकर्मी या पत्रकार सरकार को ये क्यों नहीं पूछता की उन्होंने इस हड़ताल को टालने के लिए क्या प्रयास किये ? उन्होंने हड़ताल हो जाने से लेकर अब तक इस हड़ताल को ख़त्म करवाने के लिए इमानदारी से क्या प्रयास किये? किसी के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है, क्यों की वास्तविकता तो ये है की सरकारी स्तर पर न तो इस हड़ताल को टालने के लिए कोई प्रयास किया गया ना ही हड़ताल हो जाने के बाद इसको ख़त्म करवाने के लिए कोई इमानदार प्रयास किया गया. अगर कुछ किया गया तो वो ये की चिकित्सा व्यवस्था बनाये रखने की वैकल्पिक व्यवस्थाये की गयी,जो की निरर्थक साबित हुई, रेसमा लागु करके बातचीत के रास्ते मसले को सुलझाने के बजाय और ज्यादा उलझा दिया गया, दुनिया भर की अखबारबाजी करके और टी वी चेनलों पे चिकित्सकों को गलत ठहराने का और उनको अमानवीय साबित करने का भरपूर प्रयास किया गया. हम ये नहीं कहते की चिकित्सक ही हर जगह सही है, मानते है की चिकित्सक भी कई जगह गलत होंगे लेकिन वर्तमान में तो साफ साफ सरकार की नियत में खोट नजर आ रही है. लोग चिकित्सकों को भगवान का दर्ज़ा देने की बातें तो करते है लेकिन क्या चिकित्सको के साथ  जनता या सरकार कभी भगवान जैसा व्यव्हार करती है? शायद कभी नहीं फिर जबरदस्ती किसी को भगवान का झूठा चोला पहना कर उनसे ये आशा क्यों की जाती है की वो हमेशा भगवान बनकर चोबिसों घंटे इंसानों की तीमारदारी करते रहे, मानते है की ये उनका पेशा और फ़र्ज़ है लेकिन जबरन भगवान के चोले में कैद किये जाते रहे ये चिकित्सक भी वास्तव में एक साधारण इन्सान ही है. उनको भी एक आम इन्सान की ही तरह सर्दी-गर्मी और भूख प्यास का अहसास होता है,उनको भी कम से कम ५-६ घंटे नींद लेनी आवश्यक होती है.  उनको भी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियां पूरी करनी होती है जो वो शायद किश्तों में ही पूरी कर पाते  है. जब आज जैसी कड़ाके की ठण्ड में दुनिया का हर व्यक्ति गरम रजाई में दुबका हुआ होता है तो यही डाक्टर या तो पूरी रात किसी मरीज़ की जान बचाने में लगे होते है या फिर एक ही रात में सात आठ बार उठ उठ कर मरीज देख रहे होते है. हालाँकि इसके बदले उनको फीस मिलती है लेकिन अगर किसी को साल के तीन सौ पैंसठ दिन एक रात में आठ-दस बार जागने पड़े तो फिर वो फीस अच्छी नहीं लगती है, लेकिन पेशे की गरिमा और फ़र्ज़ का अहसास मजबूर करता की वो ऐसा करे. ऐसी कड़ाके की ठण्ड में यदि किसी नरेगा में काम करने वाले  मजदूर को या फिर किसी पल्लेदारी करने वाले हमाल को यदि आप पूरी रात में किश्तों में आठ बार उठाएंगे और उस से हर बार पचास रुपये देकर कोई काम करवाएंगे तो अव्वल तो वो उठेगा ही नहीं और अगर एक दो बार उठ भी गया तो काम हरगिज़ नहीं  करेगा. और फिर भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों की गरिमा कौनसी सरकार ने रखी है. एक डाक्टर को अपनी तनख्वाह के लिए उपस्थिति प्रमाणित करवाने के लिए किसी अंगूठा छाप या  आपराधिक और शराबी जनप्रतिनिधि पर निर्भर रहना पड़ता है. ना सिर्फ निर्भर रहना पड़ता है बल्कि उसके द्वारा शोषण भी करवाना पड़ता है. भगवान की गरिमा तब कहाँ चली जाती है जब एक सिरफिरा प्रशासनिक अधिकारी किसी डाक्टर को, सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए, सैंकड़ों लोगो के बीच में सिर्फ इस लिए अपमानित करके पद-च्युत करके चला जाता है की उसके अस्पताल के किसी वार्ड के किसी पलंग पे बिछी हुई एक चद्दर का एक कोना जरा सा  फटा हुआ पाया जाता है. उस वक्त किसी को "भगवान" की गरिमा का ख्याल क्यों नहीं आता है  जब एक और सिरफिरा अधिकारी सरे-आम किसी प्रतिष्ठित डाक्टर को सिर्फ इसलिए बेइज्जत कर जाता है  की उसने किसी मरीज़ की पर्ची पर वैसी दवा क्यों नहीं लिखी जैसी की वो अधिकारी जनता पर थोपना चाहता है.उस वक्त इन भगवानों की गरिमा को तार तार क्यों कर दिया जाता है जब उसने हजारों मरीजो को अपने इलाज़ से स्वस्थ किया हो और एक मरीज़ किसी वजह से यदि मर जाता है तो सारी पब्लिक उसको मारने को दौड़ती है,सारी मीडिया उसके हाथ धोके पीछे पड़ जाती है और उसपर हत्या का मुकद्दमा चलाने की मांगे की जाती है, मानो उस मरने वाले मरीज़ को डाक्टर ने जानबूझ कर अपने हाथों से मारा हो.
कुल मिलकर बात ये है की यदि आप किसी से सौ प्रतिशत लेने की उम्मीद रखते हो तो पहले आप खुद सौ प्रतिशत देना सीखो. कम से कम सरकार चलाने वाले लोगो को तो किन्ही पूर्वाग्रहों से ग्रसित ना रहकर, मिडिया में झूठी वाह वाही लूटने के बजाय ऐसी हडतालों और आन्दोलनों को टालने या ख़त्म करने के गंभीर,सार्थक और इमानदार प्रयास करने चाहिए तब ही वो सही मायनों में एक संवेदनशील और पारदर्शी शासक साबित होंगे.

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

चीनी ड्रेगन का दुस्साहस

भारत के साथ पड़ोसियों की बहुत बड़ी समस्या है,एक तरफ पाकिस्तान जैसा छिछोरा पडोसी है जो अपने जन्म से ही भारत के लिए कोई न कोई समस्या खड़ी करता रहा है तो दूसरी तरफ चीन जैसा घुन्ना और धोखेबाज देश है जो लगातार भारत को तरह तरह से परेशान करता रहा है. पाकिस्तान जहा विश्व में आतंकवाद के जन्मदाता और युरेनियम एवम मादक पदार्थो की तस्करी के अड्डे के रूप में जाना जाता है ,वहीँ चीन पूरी दुनिया में माओवादी सोच और धोखेबाज देश के रूप में कुख्यात है. इन दोनों देशों की आजकल खूब पटरी बैठ रही है और इन्होने मिलकर  नेपाल जैसे शांत देश को दुनिया भर के आतंकवादियों और तस्करों का " ट्रांजिट पॉइंट" बना दिया है. अमेरिका और भारत जैसी शक्तियों को आँखे दिखने के लिए चीन पाकिस्तान का उपयोग करना चाहता है. इसी लिए पाकिस्तान को बहुत सारा सैन्य सहयोग और आर्थिक मदद दे रहा है ,बदले में पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर में चीन को हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्ज़ा दिया है जहाँ से उसको भारत पर नजर रखने के लिए सहूलियत हो गयी है. चीन धीरे धीरे कर के चारों ओर से भारत को घेरता जा रहा है. हिमालय के पार कश्मीर में उसने कब्ज़ा कर ही लिया है ,पाकिस्तान की धरती पर गत दिनों युद्धाभ्यास करके उसने दुनिया को ये सन्देश दे ही दिया है की चीन और पाकिस्तान एक ही थाली के बेंगन है. अब ताज़ा घटनाक्रम में चीन ने ये घोषणा की है की वो हिंद महासागर में स्थित शेसेल्स द्वीप में अपना सैनिक अड्डा स्थापित करने जा रहा है. वहां से उसको भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया पर नजर रखने में सहूलियत रहेगी. चीन की दादागिरी तो देखिये दक्षिण चीन सागर में तो वो किसी ओर को घुसने नहीं देता , वहां सैनिक अड्डा तो दूर की बात है कोई व्यापारिक या वैज्ञानिक गतिविधि भी नहीं करने देता जैसे की दक्षिण चीन सागर उसका अपना ख़रीदा हुआ हो,लेकिन हिंद महासागर में वो अपनी हर तरह की गतिविधियाँ चला रहा रहा है. सिर्फ चला ही नहीं रहा है बल्कि अपनी दादागिरी और भारत के कमजोर रवैये की वजह से दिन पर दिन बढ़ा भी रहा है. हिंद महासागर में तो ओ ऍन जी सी के सर्वे पर भी उसको ऐतराज़ है, जबकि खुद वहां सैनिक अड्डा बनाने पर आमादा है. ऐसे करते करते वो दिन दूर नहीं जब वो पूरे हिंद महासागर पर वो ऐसे नाजायज़ कब्ज़ा कर लेगा जैसा उसने दक्षिण चीन सागर पर कर रखा है. अगर चीनी ड्रेगन का विस्तार रोका नहीं गया तो एक दिन भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होगा. आवश्यक है की भारत की विदेश निति में परिवर्तन करके इसको लचीली और ढूल-मूल विदेश निति के बजाय मजबूत और स्पष्ट सोच वाली बनाया जाये और चीनी ड्रेगन के इस तरह के दुस्साहसों का मुंह-तोड़ जवाब दिया जाये.

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

तुष्टिकरण का तूफान


हिंदुस्तान को आज तक "तुष्टिकरण" नाम की बीमारी ने बहुत नुकसान पहुँचाया है. आजादी के वक़्त मोहम्मद अली जिन्ना को तुष्ट करने के लिए हिंदुस्तान के टुकड़े किये गए, तभी से हिंदुस्तान में तुष्टिकरण नाम का शब्द  परवान चढ़ निकला. अब तो इसने इतना विकराल रूप अख्तियार कर लिया है की इस तुष्टिकरण के चक्कर में जायज़-नाजायज़ भी देखा जाना दूभर हो गया है. आज हर कदम पर कार्यपालिका,न्यायपालिका,व्यवस्थापिका और लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तम्भ मीडिया सभी तुष्टिकरण में लगे है, बल्कि इन सबों में होड़ मची हुई है की कही की तुष्टिकरण की दौड़ में कही पिछड़ न जाएँ. कोई किसी समुदाय विशेष को बिना मांगे आरक्षण देने में लगा है, तो कोई उन्हें खुश रखने के लिए देश के सबसे बड़े अपराधी को एयर कंडीशन कमरे में बिठा कर बिरयानी खिला रहा है. उनके लिए विशेष पेकेजो और कल्याणकारी योजनाओं  की बरसात सी हो रही है, कही पूरे राज्य को ही विशेष दर्ज़ा हासिल है, की मानो वहा जन्म लेने वाले ऊपर वाले से भी विशेष दर्ज़ा ले  कर पैदा हुए है, और फिर  जिस मिटटी में पैदा हुए और पले-बढे है उसी को लाल करने में लग जाते है.
चौथा स्तम्भ तो सबसे ही आगे निकल जाने में लगता है, उनमे से कुछ लोग तो जैसे रोटी ही इस चीज़ की खाते है की जितना ज्यादा अल्पसंख्यक, मानवाधिकार और जिहाद जैसे शब्द छापेंगे उतने ही ज्यादा अच्छे कलमकार कहलायेंगे. भारत की पुरातन सभ्यता,संस्कृति और सनातनता का जितना ज्यादा उपहास करेंगे उतना ही अपने आपको गोरवान्वित महसूस करेंगे.
आप इस अल्पसंख्यक शब्द के विरुद्ध एक शब्द तो बोलकर देखिये दुनिया भर के चौथे स्तम्भ खाना पीना, सोना जागना सब छोड़कर तब तक आपके खिलाफ कागज़ काले करते रहेंगे जब तक की पहले और दुसरे स्तम्भ वाले आपको उठाकर अन्दर न कर दे और आपके मुह पर "सांप्रदायिक" होने का राक्षसी  मुखोटा न चिपका दे.
बाकि की कोर कसर भारत सरकार शीघ्र पूरी करने की तैयारी में है , राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की 'सलाह' के अनुसार सरकार लक्षित सांप्रदायिक हिंसा निरोधक कानून पारित करने जा रही है, फिर तो अगर आपको रास्ते चलते अगर बेवजह भी किसी ने पीट लिया और अगर वो उस श्रेणी का व्यक्ति है जिस के लिए ये कानून बनाया जा रहा है,तो आपकी भलाई इसी में रहेगी की आप चुपचाप पिटकर अपने घर चले जाये, मुंह से उफ़ भी न निकाले, क्यों की उसने अगर आप की शिकायत कर दी तो आप तो कम से कम  6 महीनो के लिए अन्दर हो जायेंगे , 6 महीनो तक तो आप किसी सुनवाई के भी हक़दार नहीं रहेंगे और 6 महीनो बाद भी आपकी सुनवाई करने वाले वो ही लोग होंगे जो ऐसे कानून बनाने वालो के अधीन तुष्टिकरण  कर रहे होंगे, इसलिए भैया अब बच के रहना तुष्टिकरण की आंधी अब तूफान का रूप लेने जा रही है.

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

लोबिंग

पिछले 9 दिनों से ठप्प चल रही संसद अगले चार दिनों के लिए स्थगित हो गयी.वैसे भी 9 दिनों में संसद में कोई भी काम नहीं हुआ सिवाय हंगामे और शोर-शराबे के. भारत की जनता से वसूले गए 135  करोड़ रूपये जरूर पानी में बह गए क्यों की संसद का एक दिन का खर्च लगभग 15 करोड़ है. खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को मंजूरी देने के फैसले ने सरकार को एक बार फिर ऐसे भंवर या चक्रव्यूह में फंसा दिया है जहाँ से वापस निकलने का रास्ता सरकार को नजर नहीं आ रहा है. अब ये मुद्दा सरकार के लिए गले में फंसी हुई हड्डी के जैसी हो गयी है जिसको न निगलते बन रहा है न ही उगलते बन रहा है. हालाँकि सरकार को चारों ओर से फंसी देख कर स्वयं सोनिया गाँधी ने इस संकट से निपटने के लिए कमान संभाली है, सरकार के वाक-चतुर और मीडिया फ्रेंडली समझे वाले चेहरों का समूह या कहिये की 'लोबी' बनायीं गयी है जो की मीडिया की हर बात का जवाब देगी,विरोधियों की हर बात का जवाब देगी, और इस मुद्दे पर आम जनता में सरकार के पक्ष में वातावरण का  निर्माण करेगी.
अमेरिका में इस तरह की कारगुजारियों को क़ानूनी मान्यता मिली हुई है, वहां इस तरह की कारगुजारियों के लिए एक शब्द प्रयुक्त किया जाता है, "लोबिंग". आम तौर पर भारत में ऐसा कोई कार्य कानूनन नहीं है लेकिन अमेरिका का कानून वहां इस काम को कानूनी मान्यता देता है वहां प्रोफेशनल लोब्बिस्ट है जो किसी कंपनी या किसी नेता के पक्ष में लोबिंग करते है और उसके के लिए वातावरण तैयार करते है. वोलमार्ट कंपनी का लोबिंग का कई करोड़ डोलर का बज़ट है. पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के एन पहले वोलमार्ट के मुख्य कार्यकारी माइक ड्यूक भारत आये थे. लगता है वो ही भारत में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के लिए जमीन तैयार कर गए,और उसका नतीजा सब के सामने है, और अब तो सरकार खुद  लोबिंग करने में लगी हुई है. हम ये नहीं मानते की लोबिंग करना बुरी बात है लेकिन लोबिंग करो तो देश के भले के लिए करो , देश को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में और मजबूत बनाने में करो,  भला देश को बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने परोसने के लिए क्या लोबिंग कर रहे हो. अरे देश के कर्ण धारों !  नीति निर्धारकों ! ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत को भूखे भेड़िये की जैसे ताक रही है की कब मौका मिले और इस देश की गरीब जनता का खून पियें. जो चमक दमक तुम्हे दिखाई  दे रही  है वो कुछ पलों की ही है, उसकी बाद आर्थिक गुलामी का अँधेरा हो जायेगा जो की चिर स्थायी होगा, इसलिए देश के नीति निर्धारकों कुछ तो समझो और सोचो........... देश को वापस गुलामी की तरफ मत धकेलो वो भी बाहरी लोगों के बहकावे में या चंद गुलाबी कागज़ टुकड़ों के लालच में........ 

रविवार, 27 नवंबर 2011

नाकारा विपक्ष


जितनी नाकारा और संवेदनाविहीन भारत की केन्द्रीय सरकार साबित हो रही है उतना या उससे कहीं ज्यादा विपक्ष नाकारा साबित हो रहा है .कमजोर विपक्ष या कहिये की नाकारा विपक्ष होने की वजह से ही सरकार बिलकुल निरंकुश हो चुकी है. मंत्रिमंडल में ऐसे फैसले लिए जा रहे है जो पूरी तरह से देश को गर्त में ले जा रहे है और इन पर किसी का भी अंकुश या डर नहीं है , कोई भी ऐसा मुद्दा जब भी संसद के सदनों में उठता है तो विपक्ष सिर्फ सदन से बाहर जाकर या फिर 5 -7  दिन संसद ठप्प करवाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते है.वो लोग ये नहीं सोचते है की जिस जनता ने सरकार में शामिल लोगो को जितवाकर ये फैसले लेने या कानून बनाने का अधिकार दिया है उसी जनता के एक वर्ग ने आप में विश्वास दिखाकर आपको संसद में भेजा है ,और वो इस लिए भेजा है की आप संसद में खड़े होकर जनता से सीधे जुड़े हुए मुद्दों पर जनता की आवाज को संसद में बुलंद करो,लेकिन आप सिर्फ कुछ दिन शोर शराबा करके उस बात को ठंडी कर देते हो और देश की जनता पर  एक और गलत फैसले को थोपने  की आजादी सरकार को  दे देते हो.
जनता आपसे आशा रखती है की जहाँ जनहित से जुड़े मुद्दे आये वहां आप वास्तव में वही बात स्वीकार करोगे जो वास्तव में जनता के हित में होगी,लेकिन कमजोर और अकर्मण्य विपक्ष की वजह से देश पर एक और गलत फैसला खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में थोपने की तैयारी चल रही है .
सरकार को भी मालूम है की विपक्ष कुछ दिन शोर मचाएगा फिर अपने आप या तो चुप हो कर बैठ जायेगा या और अन्य किसी मुद्दे को उठाकर शोर-शराबे और बहिर्गमन में लग जायेगा ,तब तक सरकार इस को लागु कर चुकी होगी.
क्या लोकतंत्र में विरोध करने के ये ही तरीके बचे है की संसद की कार्रवाही ठप्प करवा दो या फिर बाहर चले जाओ और संसद चलने का प्रतिदिन का खर्च जो लगभग शायद पंद्रह करोड़ है ,का बोझ और जनता पर डाल दो. क्यों नहीं विपक्ष सरकार के ऐसे फैसलों के खिलाफ संसद के बाहर जोरदार तरीके से विरोध करता है? क्या वो संसद के बाहर जन-आन्दोलन खड़े नहीं कर सकते या फिर प्रधानमंत्री और अन्य जिम्मेदार मंत्रियों का उनके घर या कार्यालय में घेराव या धरना देकर नहीं बैठ सकते ? क्यों नहीं वो संसद के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से देश की सार्वजनिक संपत्ति को नुक्सान पहुंचाए बिना पूरे  देश में आन्दोलन चलाकर सरकार को मजबूर  कर सकते की वो ऐसे देश विरोधी फैसलों को वापस ले.
लेकिन वो तो नेता है चाहे वो सत्ता पक्ष के हो या विपक्ष के ,आम आदमी के दर्द और कठिनाइयों को न तो समझ सकते है न ही उनका कोई सरोकार है. वो तो बस संसद में बैठ कर ऐसी योजनायें बना सकते है जो विकास के नाम पर बनती है लेकिन उनसे देश के विकास का दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता, हाँ उन नेताओं का 'विकास' जरूर हो जाता है. वो तो  नरेगा जैसी योजनाये बनाते है जिनसे देश के कर दाताओं का 35000  करोड़  रुपया नेताओं ,आला अफसरों,और सरपंचों-ग्रामसेवको,मेटों आदि में बंट जाता है और जनता के हिस्से में आती है सड़क के किनारे पर डाली हुयी मिटटी या फर्जी मस्टर-रोलों की रद्दी.
क्या करता है विपक्ष जब ऐसी योजनाओं का खाका तैयार हो रहा होता है.
अगर भारत को विदेशी व्यापारियों के जाल से बचाना है तो किसी भी हाल में देश के खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को रोकना ही होगा, ये काम  विपक्ष को प्राथमिकता से करना होगा और बल्कि सत्ता पक्ष के भी किसी सदस्य को भी यदि उचित लगे तो देश हित में पार्टी लाइन से बाहर जाकर ऐसे मुद्दों का विरोध करना चाहिए तब ही वो सही मायनों  में लोक सेवक साबित होगा.