पिछले दो दिनों से राजस्थान में सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल चल रही है. पूरे राज्य में चिकित्सा व्यवस्था लगभग ठप्प हो गयी है.अस्पतालों में हा-हाकार मचा हुआ है. आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति तो निजी चिकित्सालयों में जाकर अपना इलाज करवा लेता है लेकिन बेचारे गरीब और बेसहारा लोगों का तो भगवान ही मालिक है. हर अख़बार में और प्रत्येक चेनल पर डाक्टरों के अभाव में मरते मरीजों की फोटुए दिखाई जा रही है और साथ में ये भी दिखाया जा रहा है की जिस चिकित्सक को भगवान का रूप समझा जाता है उनकी अमानवीयता की वजह से मरीजों की जान पर बनी हुई है.
लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है, जिसको न तो मीडिया दिखा रहा है और न ही नौकर शाहों के द्वारा भ्रमित किये हुए सरकारी तंत्र को दिख पा रहा है. किसी ने भी गहराई में जाकर ये जानने की कोशिश नहीं की ,की आखिर ऐसी क्या नौबत आई की चिकित्सकों को हड़ताल जैसा कदम उठाना पड़ा ? गत जुलाई में चिकित्सकों ने एक दिन की सांकेतिक हड़ताल करी थी,उस समय सरकार और डाक्टरों के प्रतिनिधिमंडल के बीच एक समझौता हुआ था, सरकार द्वारा लिखित रूप से उस समझौते के बिन्दुओं पर तीन माह के अन्दर अन्दर अमल करने का वायदा किया गया था. उस बात को लगभग छ: माह बीत जाने के बाद भी कोई भी बिंदु अमल में लाया गया न ही किसी प्रकार का कोई उस से सम्बंधित आदेश निकाला गया. ऐसी परिस्थितियों में हड़ताल करना चिकित्सकों के लिए एक ही रास्ता बचा था. तिस पर भी सरकार बजाय हड़ताल को टालने के ईमानदार प्रयासों के, उलटे अपनी पूरी उर्जा चिकित्सकों को गलत और सरकार को सही ठहराने में लगा रही है. हिंदुस्तान में आम आदमी की ये सोच होती है की जो बात अख़बारों में छपती है या किसी भी सम्प्रेषण माध्यम से जो भी खबर आती है वो उसको अक्षरश सत्य मानता है, वो कभी भी उसकी पड़ताल करने की कोशिश नहीं करता है की क्या सच है और क्या झूठ. सरकार जनता की इसी सोच को भुनाने में लगी है. अख़बारों में ऐसे शीर्षकों के साथ ख़बरें छप रही है, "नहीं पसीजे भगवान" , "मुख्यमंत्री ने की मार्मिक अपील" आदि आदि. कोई भी मीडियाकर्मी या पत्रकार सरकार को ये क्यों नहीं पूछता की उन्होंने इस हड़ताल को टालने के लिए क्या प्रयास किये ? उन्होंने हड़ताल हो जाने से लेकर अब तक इस हड़ताल को ख़त्म करवाने के लिए इमानदारी से क्या प्रयास किये? किसी के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है, क्यों की वास्तविकता तो ये है की सरकारी स्तर पर न तो इस हड़ताल को टालने के लिए कोई प्रयास किया गया ना ही हड़ताल हो जाने के बाद इसको ख़त्म करवाने के लिए कोई इमानदार प्रयास किया गया. अगर कुछ किया गया तो वो ये की चिकित्सा व्यवस्था बनाये रखने की वैकल्पिक व्यवस्थाये की गयी,जो की निरर्थक साबित हुई, रेसमा लागु करके बातचीत के रास्ते मसले को सुलझाने के बजाय और ज्यादा उलझा दिया गया, दुनिया भर की अखबारबाजी करके और टी वी चेनलों पे चिकित्सकों को गलत ठहराने का और उनको अमानवीय साबित करने का भरपूर प्रयास किया गया. हम ये नहीं कहते की चिकित्सक ही हर जगह सही है, मानते है की चिकित्सक भी कई जगह गलत होंगे लेकिन वर्तमान में तो साफ साफ सरकार की नियत में खोट नजर आ रही है. लोग चिकित्सकों को भगवान का दर्ज़ा देने की बातें तो करते है लेकिन क्या चिकित्सको के साथ जनता या सरकार कभी भगवान जैसा व्यव्हार करती है? शायद कभी नहीं फिर जबरदस्ती किसी को भगवान का झूठा चोला पहना कर उनसे ये आशा क्यों की जाती है की वो हमेशा भगवान बनकर चोबिसों घंटे इंसानों की तीमारदारी करते रहे, मानते है की ये उनका पेशा और फ़र्ज़ है लेकिन जबरन भगवान के चोले में कैद किये जाते रहे ये चिकित्सक भी वास्तव में एक साधारण इन्सान ही है. उनको भी एक आम इन्सान की ही तरह सर्दी-गर्मी और भूख प्यास का अहसास होता है,उनको भी कम से कम ५-६ घंटे नींद लेनी आवश्यक होती है. उनको भी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियां पूरी करनी होती है जो वो शायद किश्तों में ही पूरी कर पाते है. जब आज जैसी कड़ाके की ठण्ड में दुनिया का हर व्यक्ति गरम रजाई में दुबका हुआ होता है तो यही डाक्टर या तो पूरी रात किसी मरीज़ की जान बचाने में लगे होते है या फिर एक ही रात में सात आठ बार उठ उठ कर मरीज देख रहे होते है. हालाँकि इसके बदले उनको फीस मिलती है लेकिन अगर किसी को साल के तीन सौ पैंसठ दिन एक रात में आठ-दस बार जागने पड़े तो फिर वो फीस अच्छी नहीं लगती है, लेकिन पेशे की गरिमा और फ़र्ज़ का अहसास मजबूर करता की वो ऐसा करे. ऐसी कड़ाके की ठण्ड में यदि किसी नरेगा में काम करने वाले मजदूर को या फिर किसी पल्लेदारी करने वाले हमाल को यदि आप पूरी रात में किश्तों में आठ बार उठाएंगे और उस से हर बार पचास रुपये देकर कोई काम करवाएंगे तो अव्वल तो वो उठेगा ही नहीं और अगर एक दो बार उठ भी गया तो काम हरगिज़ नहीं करेगा. और फिर भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों की गरिमा कौनसी सरकार ने रखी है. एक डाक्टर को अपनी तनख्वाह के लिए उपस्थिति प्रमाणित करवाने के लिए किसी अंगूठा छाप या आपराधिक और शराबी जनप्रतिनिधि पर निर्भर रहना पड़ता है. ना सिर्फ निर्भर रहना पड़ता है बल्कि उसके द्वारा शोषण भी करवाना पड़ता है. भगवान की गरिमा तब कहाँ चली जाती है जब एक सिरफिरा प्रशासनिक अधिकारी किसी डाक्टर को, सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए, सैंकड़ों लोगो के बीच में सिर्फ इस लिए अपमानित करके पद-च्युत करके चला जाता है की उसके अस्पताल के किसी वार्ड के किसी पलंग पे बिछी हुई एक चद्दर का एक कोना जरा सा फटा हुआ पाया जाता है. उस वक्त किसी को "भगवान" की गरिमा का ख्याल क्यों नहीं आता है जब एक और सिरफिरा अधिकारी सरे-आम किसी प्रतिष्ठित डाक्टर को सिर्फ इसलिए बेइज्जत कर जाता है की उसने किसी मरीज़ की पर्ची पर वैसी दवा क्यों नहीं लिखी जैसी की वो अधिकारी जनता पर थोपना चाहता है.उस वक्त इन भगवानों की गरिमा को तार तार क्यों कर दिया जाता है जब उसने हजारों मरीजो को अपने इलाज़ से स्वस्थ किया हो और एक मरीज़ किसी वजह से यदि मर जाता है तो सारी पब्लिक उसको मारने को दौड़ती है,सारी मीडिया उसके हाथ धोके पीछे पड़ जाती है और उसपर हत्या का मुकद्दमा चलाने की मांगे की जाती है, मानो उस मरने वाले मरीज़ को डाक्टर ने जानबूझ कर अपने हाथों से मारा हो.
कुल मिलकर बात ये है की यदि आप किसी से सौ प्रतिशत लेने की उम्मीद रखते हो तो पहले आप खुद सौ प्रतिशत देना सीखो. कम से कम सरकार चलाने वाले लोगो को तो किन्ही पूर्वाग्रहों से ग्रसित ना रहकर, मिडिया में झूठी वाह वाही लूटने के बजाय ऐसी हडतालों और आन्दोलनों को टालने या ख़त्म करने के गंभीर,सार्थक और इमानदार प्रयास करने चाहिए तब ही वो सही मायनों में एक संवेदनशील और पारदर्शी शासक साबित होंगे.
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