गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

जबरदस्ती के भगवान


पिछले दो दिनों से राजस्थान में सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल चल रही है. पूरे राज्य में चिकित्सा व्यवस्था लगभग ठप्प हो गयी है.अस्पतालों में हा-हाकार मचा हुआ है. आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति तो निजी चिकित्सालयों में जाकर अपना इलाज करवा लेता है लेकिन बेचारे गरीब और बेसहारा लोगों का तो भगवान ही मालिक है. हर अख़बार में और प्रत्येक चेनल पर डाक्टरों के अभाव में मरते मरीजों की फोटुए दिखाई जा रही है और साथ में ये भी दिखाया जा रहा है की जिस चिकित्सक को भगवान का रूप समझा जाता है उनकी अमानवीयता की वजह से मरीजों की जान पर बनी हुई है.
लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है, जिसको न तो मीडिया दिखा रहा है और न ही नौकर शाहों के द्वारा भ्रमित किये हुए सरकारी तंत्र को दिख पा रहा है. किसी ने भी गहराई में जाकर ये जानने की कोशिश नहीं की ,की आखिर ऐसी क्या नौबत आई की चिकित्सकों को हड़ताल जैसा कदम उठाना पड़ा ? गत जुलाई में चिकित्सकों ने एक दिन की सांकेतिक हड़ताल करी थी,उस समय सरकार और डाक्टरों के प्रतिनिधिमंडल के बीच एक समझौता हुआ था, सरकार द्वारा लिखित रूप से उस समझौते के बिन्दुओं पर तीन माह के अन्दर अन्दर अमल करने का वायदा किया गया था. उस बात को लगभग छ: माह बीत जाने के बाद भी कोई भी बिंदु अमल में लाया गया न ही किसी प्रकार का कोई  उस से सम्बंधित आदेश निकाला गया. ऐसी परिस्थितियों में हड़ताल करना चिकित्सकों के लिए एक ही रास्ता बचा था. तिस पर भी सरकार बजाय हड़ताल को टालने के ईमानदार प्रयासों के, उलटे अपनी पूरी उर्जा चिकित्सकों को गलत और सरकार को सही ठहराने में लगा रही है. हिंदुस्तान में आम आदमी की ये सोच होती है की जो बात अख़बारों में छपती है या किसी भी सम्प्रेषण माध्यम से जो भी खबर आती है वो उसको अक्षरश सत्य मानता है, वो कभी भी उसकी पड़ताल करने की कोशिश नहीं करता है की क्या सच है और क्या झूठ.  सरकार जनता की इसी सोच को भुनाने में लगी है. अख़बारों में ऐसे शीर्षकों के साथ ख़बरें छप रही है, "नहीं पसीजे भगवान" , "मुख्यमंत्री ने की मार्मिक अपील" आदि आदि. कोई भी मीडियाकर्मी या पत्रकार सरकार को ये क्यों नहीं पूछता की उन्होंने इस हड़ताल को टालने के लिए क्या प्रयास किये ? उन्होंने हड़ताल हो जाने से लेकर अब तक इस हड़ताल को ख़त्म करवाने के लिए इमानदारी से क्या प्रयास किये? किसी के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है, क्यों की वास्तविकता तो ये है की सरकारी स्तर पर न तो इस हड़ताल को टालने के लिए कोई प्रयास किया गया ना ही हड़ताल हो जाने के बाद इसको ख़त्म करवाने के लिए कोई इमानदार प्रयास किया गया. अगर कुछ किया गया तो वो ये की चिकित्सा व्यवस्था बनाये रखने की वैकल्पिक व्यवस्थाये की गयी,जो की निरर्थक साबित हुई, रेसमा लागु करके बातचीत के रास्ते मसले को सुलझाने के बजाय और ज्यादा उलझा दिया गया, दुनिया भर की अखबारबाजी करके और टी वी चेनलों पे चिकित्सकों को गलत ठहराने का और उनको अमानवीय साबित करने का भरपूर प्रयास किया गया. हम ये नहीं कहते की चिकित्सक ही हर जगह सही है, मानते है की चिकित्सक भी कई जगह गलत होंगे लेकिन वर्तमान में तो साफ साफ सरकार की नियत में खोट नजर आ रही है. लोग चिकित्सकों को भगवान का दर्ज़ा देने की बातें तो करते है लेकिन क्या चिकित्सको के साथ  जनता या सरकार कभी भगवान जैसा व्यव्हार करती है? शायद कभी नहीं फिर जबरदस्ती किसी को भगवान का झूठा चोला पहना कर उनसे ये आशा क्यों की जाती है की वो हमेशा भगवान बनकर चोबिसों घंटे इंसानों की तीमारदारी करते रहे, मानते है की ये उनका पेशा और फ़र्ज़ है लेकिन जबरन भगवान के चोले में कैद किये जाते रहे ये चिकित्सक भी वास्तव में एक साधारण इन्सान ही है. उनको भी एक आम इन्सान की ही तरह सर्दी-गर्मी और भूख प्यास का अहसास होता है,उनको भी कम से कम ५-६ घंटे नींद लेनी आवश्यक होती है.  उनको भी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियां पूरी करनी होती है जो वो शायद किश्तों में ही पूरी कर पाते  है. जब आज जैसी कड़ाके की ठण्ड में दुनिया का हर व्यक्ति गरम रजाई में दुबका हुआ होता है तो यही डाक्टर या तो पूरी रात किसी मरीज़ की जान बचाने में लगे होते है या फिर एक ही रात में सात आठ बार उठ उठ कर मरीज देख रहे होते है. हालाँकि इसके बदले उनको फीस मिलती है लेकिन अगर किसी को साल के तीन सौ पैंसठ दिन एक रात में आठ-दस बार जागने पड़े तो फिर वो फीस अच्छी नहीं लगती है, लेकिन पेशे की गरिमा और फ़र्ज़ का अहसास मजबूर करता की वो ऐसा करे. ऐसी कड़ाके की ठण्ड में यदि किसी नरेगा में काम करने वाले  मजदूर को या फिर किसी पल्लेदारी करने वाले हमाल को यदि आप पूरी रात में किश्तों में आठ बार उठाएंगे और उस से हर बार पचास रुपये देकर कोई काम करवाएंगे तो अव्वल तो वो उठेगा ही नहीं और अगर एक दो बार उठ भी गया तो काम हरगिज़ नहीं  करेगा. और फिर भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों की गरिमा कौनसी सरकार ने रखी है. एक डाक्टर को अपनी तनख्वाह के लिए उपस्थिति प्रमाणित करवाने के लिए किसी अंगूठा छाप या  आपराधिक और शराबी जनप्रतिनिधि पर निर्भर रहना पड़ता है. ना सिर्फ निर्भर रहना पड़ता है बल्कि उसके द्वारा शोषण भी करवाना पड़ता है. भगवान की गरिमा तब कहाँ चली जाती है जब एक सिरफिरा प्रशासनिक अधिकारी किसी डाक्टर को, सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए, सैंकड़ों लोगो के बीच में सिर्फ इस लिए अपमानित करके पद-च्युत करके चला जाता है की उसके अस्पताल के किसी वार्ड के किसी पलंग पे बिछी हुई एक चद्दर का एक कोना जरा सा  फटा हुआ पाया जाता है. उस वक्त किसी को "भगवान" की गरिमा का ख्याल क्यों नहीं आता है  जब एक और सिरफिरा अधिकारी सरे-आम किसी प्रतिष्ठित डाक्टर को सिर्फ इसलिए बेइज्जत कर जाता है  की उसने किसी मरीज़ की पर्ची पर वैसी दवा क्यों नहीं लिखी जैसी की वो अधिकारी जनता पर थोपना चाहता है.उस वक्त इन भगवानों की गरिमा को तार तार क्यों कर दिया जाता है जब उसने हजारों मरीजो को अपने इलाज़ से स्वस्थ किया हो और एक मरीज़ किसी वजह से यदि मर जाता है तो सारी पब्लिक उसको मारने को दौड़ती है,सारी मीडिया उसके हाथ धोके पीछे पड़ जाती है और उसपर हत्या का मुकद्दमा चलाने की मांगे की जाती है, मानो उस मरने वाले मरीज़ को डाक्टर ने जानबूझ कर अपने हाथों से मारा हो.
कुल मिलकर बात ये है की यदि आप किसी से सौ प्रतिशत लेने की उम्मीद रखते हो तो पहले आप खुद सौ प्रतिशत देना सीखो. कम से कम सरकार चलाने वाले लोगो को तो किन्ही पूर्वाग्रहों से ग्रसित ना रहकर, मिडिया में झूठी वाह वाही लूटने के बजाय ऐसी हडतालों और आन्दोलनों को टालने या ख़त्म करने के गंभीर,सार्थक और इमानदार प्रयास करने चाहिए तब ही वो सही मायनों में एक संवेदनशील और पारदर्शी शासक साबित होंगे.

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

चीनी ड्रेगन का दुस्साहस

भारत के साथ पड़ोसियों की बहुत बड़ी समस्या है,एक तरफ पाकिस्तान जैसा छिछोरा पडोसी है जो अपने जन्म से ही भारत के लिए कोई न कोई समस्या खड़ी करता रहा है तो दूसरी तरफ चीन जैसा घुन्ना और धोखेबाज देश है जो लगातार भारत को तरह तरह से परेशान करता रहा है. पाकिस्तान जहा विश्व में आतंकवाद के जन्मदाता और युरेनियम एवम मादक पदार्थो की तस्करी के अड्डे के रूप में जाना जाता है ,वहीँ चीन पूरी दुनिया में माओवादी सोच और धोखेबाज देश के रूप में कुख्यात है. इन दोनों देशों की आजकल खूब पटरी बैठ रही है और इन्होने मिलकर  नेपाल जैसे शांत देश को दुनिया भर के आतंकवादियों और तस्करों का " ट्रांजिट पॉइंट" बना दिया है. अमेरिका और भारत जैसी शक्तियों को आँखे दिखने के लिए चीन पाकिस्तान का उपयोग करना चाहता है. इसी लिए पाकिस्तान को बहुत सारा सैन्य सहयोग और आर्थिक मदद दे रहा है ,बदले में पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर में चीन को हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्ज़ा दिया है जहाँ से उसको भारत पर नजर रखने के लिए सहूलियत हो गयी है. चीन धीरे धीरे कर के चारों ओर से भारत को घेरता जा रहा है. हिमालय के पार कश्मीर में उसने कब्ज़ा कर ही लिया है ,पाकिस्तान की धरती पर गत दिनों युद्धाभ्यास करके उसने दुनिया को ये सन्देश दे ही दिया है की चीन और पाकिस्तान एक ही थाली के बेंगन है. अब ताज़ा घटनाक्रम में चीन ने ये घोषणा की है की वो हिंद महासागर में स्थित शेसेल्स द्वीप में अपना सैनिक अड्डा स्थापित करने जा रहा है. वहां से उसको भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया पर नजर रखने में सहूलियत रहेगी. चीन की दादागिरी तो देखिये दक्षिण चीन सागर में तो वो किसी ओर को घुसने नहीं देता , वहां सैनिक अड्डा तो दूर की बात है कोई व्यापारिक या वैज्ञानिक गतिविधि भी नहीं करने देता जैसे की दक्षिण चीन सागर उसका अपना ख़रीदा हुआ हो,लेकिन हिंद महासागर में वो अपनी हर तरह की गतिविधियाँ चला रहा रहा है. सिर्फ चला ही नहीं रहा है बल्कि अपनी दादागिरी और भारत के कमजोर रवैये की वजह से दिन पर दिन बढ़ा भी रहा है. हिंद महासागर में तो ओ ऍन जी सी के सर्वे पर भी उसको ऐतराज़ है, जबकि खुद वहां सैनिक अड्डा बनाने पर आमादा है. ऐसे करते करते वो दिन दूर नहीं जब वो पूरे हिंद महासागर पर वो ऐसे नाजायज़ कब्ज़ा कर लेगा जैसा उसने दक्षिण चीन सागर पर कर रखा है. अगर चीनी ड्रेगन का विस्तार रोका नहीं गया तो एक दिन भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होगा. आवश्यक है की भारत की विदेश निति में परिवर्तन करके इसको लचीली और ढूल-मूल विदेश निति के बजाय मजबूत और स्पष्ट सोच वाली बनाया जाये और चीनी ड्रेगन के इस तरह के दुस्साहसों का मुंह-तोड़ जवाब दिया जाये.

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

तुष्टिकरण का तूफान


हिंदुस्तान को आज तक "तुष्टिकरण" नाम की बीमारी ने बहुत नुकसान पहुँचाया है. आजादी के वक़्त मोहम्मद अली जिन्ना को तुष्ट करने के लिए हिंदुस्तान के टुकड़े किये गए, तभी से हिंदुस्तान में तुष्टिकरण नाम का शब्द  परवान चढ़ निकला. अब तो इसने इतना विकराल रूप अख्तियार कर लिया है की इस तुष्टिकरण के चक्कर में जायज़-नाजायज़ भी देखा जाना दूभर हो गया है. आज हर कदम पर कार्यपालिका,न्यायपालिका,व्यवस्थापिका और लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तम्भ मीडिया सभी तुष्टिकरण में लगे है, बल्कि इन सबों में होड़ मची हुई है की कही की तुष्टिकरण की दौड़ में कही पिछड़ न जाएँ. कोई किसी समुदाय विशेष को बिना मांगे आरक्षण देने में लगा है, तो कोई उन्हें खुश रखने के लिए देश के सबसे बड़े अपराधी को एयर कंडीशन कमरे में बिठा कर बिरयानी खिला रहा है. उनके लिए विशेष पेकेजो और कल्याणकारी योजनाओं  की बरसात सी हो रही है, कही पूरे राज्य को ही विशेष दर्ज़ा हासिल है, की मानो वहा जन्म लेने वाले ऊपर वाले से भी विशेष दर्ज़ा ले  कर पैदा हुए है, और फिर  जिस मिटटी में पैदा हुए और पले-बढे है उसी को लाल करने में लग जाते है.
चौथा स्तम्भ तो सबसे ही आगे निकल जाने में लगता है, उनमे से कुछ लोग तो जैसे रोटी ही इस चीज़ की खाते है की जितना ज्यादा अल्पसंख्यक, मानवाधिकार और जिहाद जैसे शब्द छापेंगे उतने ही ज्यादा अच्छे कलमकार कहलायेंगे. भारत की पुरातन सभ्यता,संस्कृति और सनातनता का जितना ज्यादा उपहास करेंगे उतना ही अपने आपको गोरवान्वित महसूस करेंगे.
आप इस अल्पसंख्यक शब्द के विरुद्ध एक शब्द तो बोलकर देखिये दुनिया भर के चौथे स्तम्भ खाना पीना, सोना जागना सब छोड़कर तब तक आपके खिलाफ कागज़ काले करते रहेंगे जब तक की पहले और दुसरे स्तम्भ वाले आपको उठाकर अन्दर न कर दे और आपके मुह पर "सांप्रदायिक" होने का राक्षसी  मुखोटा न चिपका दे.
बाकि की कोर कसर भारत सरकार शीघ्र पूरी करने की तैयारी में है , राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की 'सलाह' के अनुसार सरकार लक्षित सांप्रदायिक हिंसा निरोधक कानून पारित करने जा रही है, फिर तो अगर आपको रास्ते चलते अगर बेवजह भी किसी ने पीट लिया और अगर वो उस श्रेणी का व्यक्ति है जिस के लिए ये कानून बनाया जा रहा है,तो आपकी भलाई इसी में रहेगी की आप चुपचाप पिटकर अपने घर चले जाये, मुंह से उफ़ भी न निकाले, क्यों की उसने अगर आप की शिकायत कर दी तो आप तो कम से कम  6 महीनो के लिए अन्दर हो जायेंगे , 6 महीनो तक तो आप किसी सुनवाई के भी हक़दार नहीं रहेंगे और 6 महीनो बाद भी आपकी सुनवाई करने वाले वो ही लोग होंगे जो ऐसे कानून बनाने वालो के अधीन तुष्टिकरण  कर रहे होंगे, इसलिए भैया अब बच के रहना तुष्टिकरण की आंधी अब तूफान का रूप लेने जा रही है.

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

लोबिंग

पिछले 9 दिनों से ठप्प चल रही संसद अगले चार दिनों के लिए स्थगित हो गयी.वैसे भी 9 दिनों में संसद में कोई भी काम नहीं हुआ सिवाय हंगामे और शोर-शराबे के. भारत की जनता से वसूले गए 135  करोड़ रूपये जरूर पानी में बह गए क्यों की संसद का एक दिन का खर्च लगभग 15 करोड़ है. खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को मंजूरी देने के फैसले ने सरकार को एक बार फिर ऐसे भंवर या चक्रव्यूह में फंसा दिया है जहाँ से वापस निकलने का रास्ता सरकार को नजर नहीं आ रहा है. अब ये मुद्दा सरकार के लिए गले में फंसी हुई हड्डी के जैसी हो गयी है जिसको न निगलते बन रहा है न ही उगलते बन रहा है. हालाँकि सरकार को चारों ओर से फंसी देख कर स्वयं सोनिया गाँधी ने इस संकट से निपटने के लिए कमान संभाली है, सरकार के वाक-चतुर और मीडिया फ्रेंडली समझे वाले चेहरों का समूह या कहिये की 'लोबी' बनायीं गयी है जो की मीडिया की हर बात का जवाब देगी,विरोधियों की हर बात का जवाब देगी, और इस मुद्दे पर आम जनता में सरकार के पक्ष में वातावरण का  निर्माण करेगी.
अमेरिका में इस तरह की कारगुजारियों को क़ानूनी मान्यता मिली हुई है, वहां इस तरह की कारगुजारियों के लिए एक शब्द प्रयुक्त किया जाता है, "लोबिंग". आम तौर पर भारत में ऐसा कोई कार्य कानूनन नहीं है लेकिन अमेरिका का कानून वहां इस काम को कानूनी मान्यता देता है वहां प्रोफेशनल लोब्बिस्ट है जो किसी कंपनी या किसी नेता के पक्ष में लोबिंग करते है और उसके के लिए वातावरण तैयार करते है. वोलमार्ट कंपनी का लोबिंग का कई करोड़ डोलर का बज़ट है. पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के एन पहले वोलमार्ट के मुख्य कार्यकारी माइक ड्यूक भारत आये थे. लगता है वो ही भारत में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के लिए जमीन तैयार कर गए,और उसका नतीजा सब के सामने है, और अब तो सरकार खुद  लोबिंग करने में लगी हुई है. हम ये नहीं मानते की लोबिंग करना बुरी बात है लेकिन लोबिंग करो तो देश के भले के लिए करो , देश को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में और मजबूत बनाने में करो,  भला देश को बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने परोसने के लिए क्या लोबिंग कर रहे हो. अरे देश के कर्ण धारों !  नीति निर्धारकों ! ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत को भूखे भेड़िये की जैसे ताक रही है की कब मौका मिले और इस देश की गरीब जनता का खून पियें. जो चमक दमक तुम्हे दिखाई  दे रही  है वो कुछ पलों की ही है, उसकी बाद आर्थिक गुलामी का अँधेरा हो जायेगा जो की चिर स्थायी होगा, इसलिए देश के नीति निर्धारकों कुछ तो समझो और सोचो........... देश को वापस गुलामी की तरफ मत धकेलो वो भी बाहरी लोगों के बहकावे में या चंद गुलाबी कागज़ टुकड़ों के लालच में........