शनिवार, 22 जून 2013

उत्तराखण्ड त्रासदी : जिम्मेदार कौन ?

उत्तराखण्ड में भीषण प्राकृतिक आपदा ने हर एक हिन्दुस्तानी कि आत्मा को झकझोर दिया है। जो तबाही का मंजर प्रिन्ट और विजुअल मीडिया द्वारा दिखाया जा रहा है , उन को देख देख कर अन्तर्मन की गहराई तक मानव शरीर की नश्वरता और ईश्वर की सत्ता की परिकल्पना की प्रामाणिकता का अहसास स्वतः ही हो उठता है. हालाँकि कुछ लोग जो की ईश्वर  की सत्ता मैं विश्वास नहीं रखते है वो इसको अपनी विचारधारा के अनुसार इस रूप मैं भी देखते है की जो तीर्थयात्री भक्ति भावना लेकर प्रभु केदारनाथ के दर्शन के लिए गए थे उनको भगवान् बचा क्यों न सका, इस प्रकार वो अपनी सोच और समझ के मुताबिक इस घटना का तारतम्य बिठाने की कोशिश मैं लगे है. ऐसे लोगो मैं तथाकथित सोशल  एक्टिविस्ट और मार्क्सवादी कलमकार किस्म के लोग शामिल है .इन लोगो की रोजी-रोटी भी तो इसी आधार पर चलती है जितना ज्यादा वो भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखा पाएंगे उतना ही वो अपनी विचारधारा मैं ऊँचे उठ पायेंगे . खैर . . . . हिंदुस्तान मैं हर नागरिक को अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है।
                            कुछ लोगो का मत इनसे भिन्न है वो तीर्थयात्रियो द्वारा पहाडो पर फेलाए जा रहे प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराते है. कुछ-कुछ इस बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ लेकिन सारा दोष तीर्थयात्रियो के माथे मढ देना गलत है. जितने जिम्मेदार बाहर से तीर्थयात्रियो के रूप मैं जाने वाले लोग है उस से कही ज्यादा गुना जिम्मेदार  वहां  के स्थानीय निवासी है  जो की वहां व्यवसायिक गतिविधिया चला रहे है. साथ ही वो लोग भी जिम्मेदार  है जो वहां  पर्यावरण और पहाड़ की शुद्धता को बनाये रखने के लिए उत्तरदायी  है और इस कार्य की मोटी  तनख्वाह उठाते है. क्यों ऐसी नौबत आई की वहां सेंकडो की संख्या मैं होटल और अन्य व्यवसायिक गतिविधिया संचालित हो रही है. लोग ये तर्क देते है की पिछले कुछ सालो मैं तीर्थयात्रियो की संख्या बेतहाशा बढ़ गयी है जिस की वजह से पहाड़ पर व्यावसायिक  गतिविधिया भी बेतहाशा बढ़  गयी है। लेकिन कही न कही उन  लोगो की स्वार्थ-लोलूपता ज़िम्मेदार है. मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ, राजस्तान के सीकर शहर के पास हर्ष का पहाड़ एक जगह है, जहा भगवन शिव और भैरव का अति प्राचीन मंदिर स्थित है ,यों तो पूरे साल ही वह श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है लेकिन बरसात के मौसम मैं प्रतिदिन हजारों लोग वहां धार्मिक  आस्था और प्राकृतिक छटा का मिश्रित आनंद लेने जाते है , वो पूरा स्थान वन विभाग के द्वारा संरक्षित है और वहां किसी भी प्रकार की व्यासायिक गतिविधिया संचालित करने पर रोक है. ऐसे मनोरम स्थान पर अगर होटल रिसोर्ट या होली डे होम खोल दिए जाए, कुछ खाने पीने की दुकाने और कुछ शोपिंग करने के लिए खुल जाये तो स्वतः ही ये स्थान एक पयटन स्थल के रूप मैं विकसित हो जायेगा  लेकिन आज दिन तक वहां पर कोई भी ऐसी व्यावसायिक गतिविधि नहीं चल रही है. मैं धन्यवाद देता हूँ राजस्थान वन विभाग के उन अधिकारियों - कर्मचारियों को जिन्होंने अपने कर्तव्य को बखूबी निभाते हुए आज तक इस मनोरम स्थान को सुरक्षित रखा है.
                 पूरे हिंदुस्तान मैं इस त्रासदी के पीडितो की सहायता करने की स्वतः-स्फूर्त भावना जग पड़ी है , लोग अपने अपने तरीके से पीडितो की मदद करने को आगे  आ रहे है. जो आर्थिक रूप से सक्षम है वो आर्थिक योगदान कर रहे है. कुछ लोग इसके लिए जाग्रति फेलाने का काम कर रहे है। कुछ कर्मठ और उत्साही लोग एक कदम आगे बढाकर स्वयं उत्तराखंड जा पहुंचे है और सीधे राहत और बचाव कार्य मैं योगदान दे रहे है। मैं भारतीय सेना का वैसे भी बहुत बड़ा फेन हूँ, मेरे मन मैं भगवन के बाद अगर किसी के लिए सबसे ज्यादा सम्मान है तो इस भारतवर्ष की महान सेना और सैनिकों के लिए है और आज ये सम्मान और ज्यादा बढ़ गया है जब मैं टीवी और अख़बारों मैं अपनी जान पर खेल कर नागरिको को बचाते हुए सैनिको को देखता हूँ . राजस्थान के बहुत से लोग वहां फंसे हुए है कुछ लोग लापता है, कुछ मारे भी जा चुके है,  मैं साधुवाद देता हूँ राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत और उनके मातहत प्रशासनिक अधिकारियो-कर्मचारियों को जो पिछले दो दिनों से खुद देहरादून मैं कैंप करे हुए है और वहां फंसे हुए राजस्थानियों की हर संभव मदद कर रहे है . साथ ही मैं गुजारिश करता हूँ हर भारतीय नागरिक से की मुसीबत की इस घडी मैं पीडितो की हर संभव सहायता करने की पुरजोर कोशिश करे और इस दिव्य देवस्थान के पुनर्निर्माण मैं अपना तन-मन-धन से योगदान डे.
जय हिन्द !
जय भारत !

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