बुधवार, 22 अगस्त 2012

बचपन की मेरी प्रतिज्ञा


बचपन में जैसे ही होश संभाला तो स्कूल में प्रार्थना के पश्चात् हम सब से एक प्रतिज्ञा करवायी जाती थी,उस प्रतिज्ञा का एक एक शब्द आज भी मेरे स्मृति-पटल पर अमिट स्याही से छपा हुआ है. प्रतिज्ञा की पहली ही लाइन कुछ ऐसे हुआ करती थी," मैं एक भारतीय हूँ,समस्त भारतीय मेरे भाई बहन है......"
                 भारत के राजाओं ( तथाकथित जनप्रतिनिधियों ) को जाने क्या सूझी है की वो इस प्रतिज्ञा को झुठलाने में लगे है, भाईचारा जो शाश्वत रूप से हिंदुस्तान में रचा बसा है उसको अपनी वोटों की फसल काटने के लिए  जाती और धर्म आधारित आरक्षण को पदोन्नति में भी  लागु करके वर्ग संघर्ष के माध्यम से इस भाईचारे को नेस्तनाबूद करने का कुत्सित विचार रखते है.
                  अब तो पानी सर के ऊपर से बहाने की तैयारी की जा रही है. जरा सोचिये की अगर दो सगे भाइयों में उनके माँ-बाप ही अगर विभेद करने लग जाए तो उन भाइयों में प्रेम कैसे कायम रहेगा.नियुक्तियां तो नियुक्तियां अब तो पदोन्नति में भी आरक्षण लागू करने की कवायद चल रही है. जान बूझ कर वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देकर अपना स्वार्थ पूर्ति की कोशिश की जा रही है. पहले भी आरक्षण के सहारे कुछ राजनेताओं ने भरपूर वोटों की फसल काटी है और काटते जा  रहे है. और इन लोगों का दुस्साहस तो देखिये अपनी स्वार्थ-पूर्ती के लिए ये भारत के संविधान को भी ठेंगा दिखाना चाह रहे है. अनेकों बार सर्वोच्च न्यायालय ने इनके पदोन्नति में भी आरक्षण देने के इस कुत्सित प्रयास को रोक दिया तो अब इन लोगो नें ऐसा रास्ता अख्तियार किया है की संसद में विधेयक पारित करवाकर संविधान में संशोधन करवाकर हमेशा के लिए इनके वोटों की फसल में बार बार आड़े आ रहे भारत के सर्वोच्च न्यायालय को भी मजबूर कर दिया जाए की वो कानून के दायरे में आकर इनकी वोटों की फसल को रोक नहीं सके.
                   पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए लाये जा रहे इस विधेयक पर सहमती बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाकर सबको इसके लिए राजी करने के प्रयास किये गए, उस बैठक में ये देखकर बहुत बड़ा धक्का लगा की कोई भी राजनैतिक पार्टी ऐसे बेतुके विधेयकों का स्पष्ट तौर पर विरोध करने की हिमाकत नहीं कर सकी सिवाय सपा के, और सपा ने भी सिर्फ इसीलिए विरोध किया की उनको तो हर हाल में मायावती का विरोध करना है,और देश और देशवासियों से कोई सरोकार नहीं है.आज भारत की सारी राजनैतिक पार्टिया वोटों की राजनीती के पीछे भारत की एकता को ताक में रखती जा रही है, मुझे तो ये भी समझ में नहीं आ रहा की आने वाले आम चुनावों में किसको वोट करूँगा, कोई सांपनाथ नजर आ रहा है और कोई नागनाथ.
                   ऐसे में लगता नहीं की हिंदुस्तान में ज्यादा लम्बे समय तक इस कुत्सित प्रयास को रोका जा सकेगा, हाँ अगर वर्ग-संघर्ष पैदा हो जाता है तो भी इन राजनेताओं को तो उसमे भी वोटों की फसल उगाना बखूबी आता है.इस तरह से इनके तो दोनों ही हाथों में लड्डू है.
               लेकिन समझ में नहीं आता की बचपन में ली हुयी उस प्रतिज्ञा का क्या होगा ....... अगर मुझसे योग्यता में कमतर कोई व्यक्ति जो की पहले मुझसे जूनियर था और मेरे सामने ही अपनी जाती के लेबल की वजह से मेरा अफसर बन जाये, जबकि वो उस पद के लिए योग्यता नहीं रखता, और में अपने आप को ठगा सा महसूस करूं, तो मेरी वो प्रतिज्ञा कैसे कायम रह पायेगी, मैं कैसे उसको अपना भाई समझ पाउँगा......